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जीने की ललक में मौत को गले लगाती जिन्दगी

Posted On: 5 Apr, 2013 Others में

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अभी बोर्ड की परिक्षाये खत्म हुयी है अभी परीक्षा परिणाम भी नहीं आये और अखबारों में नम्बर कम आने की आशंका के चलते कितने ही बच्चो के द्वारा अपनी जीवन लीला समाप्त करने की खबरे आनी शुरू हो गयी | आश्चर्य होता है यह कैसा समय शुरू हुआ है कि मात्र पन्द्रह -सोलह वर्ष की आयु में अपने करियर को ले कर इतनी चिंता ? समझ में नहीं आता की कहाँ खो गया वह मासूम बचपन जिसमे सिर्फ शैतानियाँ होती थी याद करो तो लगता है की कितना सुकून भरा बचपन था पढाई तो कभी हौव्वा रहा ही नहीं जो फर्स्ट आता है आता रहे हमें तो पास हो जाने भर से ही मिठाइयाँ मिल जाती थी थोडा बहुत डांट -डपट इससे अच्छा नम्बर ला सकते थे !! और जैसे की रूटीन में हर पैरेंट्स अपने बच्चो के साथ पेश आते है मगर पढाई -लिखाई भी इतना आतंकित कर सकता है यह आज के इस दौर को देखने पर समझ में आता है दरअसल पहले के लोग अपनी जिन्दगी को वर्तमान में जी लेते थे भविष्य की इतनी चिंता नही रहती थी की क्या जमा कर ले प्यार ,रिश्ते मोह , माया सभी की जरुरतो को देखना और अपने वर्तमान में ही खुश रहना शायद उनकी प्राथमिकता होती थी लेकिन भविष्य की चिंता इस पीढ़ी की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है और यही कारण है की छोटे -छोटे बच्चो को अपना भविष्य अंधकारमय नजर आने लगा है रही सही कसर दूसरों के साथ तुलनात्मक प्रतिस्पर्धा के चलते अपने अंदर इतनी कमियां नजर आने लगती है कि उन्हें अपने जीवन को समाप्त करना ज्यादा आसान रास्ता समझ में आता है | बहुत जरुरी है कि हर पैरेंट्स अपने बच्चो की सिर्फ जरुरत न पूरा करे बल्कि उसके साथ ज्यादा से ज्यादा समय भी गुजारे सबसे बड़ी बात कि एच एस सी या एस एस सी कि परीक्षाओ के मार्क्स के आधार पर जिस भी कालेज में या जिस भी ब्रांच में दाखिला मिलता हो उसे सिर्फ एक आधार समझे क्योंकि इतनी कम उम्र होती है कि अगर साइंस ले कर पढ़ रहे हो तो अचानक लगता है कि इस विषय में बहुत मेहनत है इससे बढिया आर्ट या कामर्स ले कर पढ़ लेते तो अच्छा रहता और सबसे अच्छी बात यह है कि एक नहीं अनेक विषय है और सभी के साथ इतने क्षेत्र जुड़े है आगे बढ़ने के आज टेक्न्लाजी इतनी विकसित हो चुकी है जानकारी का पूरा संसार एक क्लिक पर कितनी जानकारियां उपलब्ध हो जाती है | यह कहना की परिवार छोटा हो रहा है और बच्चो को ज्यादा देखभाल नहीं हो रही है तर्कसंगत नहीं है अगर परिवार छोटे हो रहे है तो माता-पिता भी पहले से कही ज्यादा अपने बच्चो का केयर भी कर रहे है हाँ यह बात अलग है कि बच्चो से उनकी अपेक्षाए बहुत बढ़ चुकी है इस बात का विशेष ख्याल रखना पड़ेगा कि बच्चो पर अपनी महत्त्वकांक्षा का बोझ न डाले और उन्हें अपनी जिन्दगी जीने का मौका दे सबसे पहले तो उन्हें अपने बच्चो को समझना होगा हर बच्चे की काबिलियत अलग -अलग होती है उनकी तुलना किसी के साथ न करे वे जो भी है जैसे भी है अपने आप में महत्त्वपूर्ण है वे औरो से अलग है वे अपने माता -पिता के लिए बहुत मायने रखते है | उनकी जिन्दगी सबसे कीमती है अगर जीवन बचा रहेगा तो बहुत सी नयी राह मिलेगी जिस पर चल कर वे एक सुन्दर भविष्य का निर्माण कर सकते है |

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

kumar kuldeep के द्वारा
April 10, 2013

सर्वप्रथम तो आपको धन्‍यवाद । आपने बहुत ही सुन्‍दर विषय चुना जिसका महत्‍व आज के युग में कुछ ज्‍यादा है, अक्‍सर युवा फेल-पास के चक्‍कर में आकर तनावग्रस्‍त हो जाते हैं और जीवन को तुच्‍छ समझकर समाप्‍त करने की सोचने लगते हैं। आपने एक अतिसुन्‍दर विचार रखा है और आशा है कि आगे भी ऐसा ही लिख्‍ाती रहेंगी। …..कुलदीप

    Rachna Varma के द्वारा
    April 13, 2013

    धन्यवाद |


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