सीधी बात

सुलझी सोच, समग्र विकास

103 Posts

871 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1448 postid : 385

मीडिया जागरूक करे न कि उद्वेलित (provoked ) ( jagran junction forum )

Posted On: 8 May, 2013 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

इसमें दो राय नहीं कि एक लोकतान्त्रिक देश में लोकतंत्र के चार मजबूत स्तम्भ के रूप में पत्रकारिता कि भूमिका सर्वविदित है बात यदि हम आजादी के दौर की करे तो रेडियो और अखबार ही वह माध्यम बना जिसके जरिये आजाद देश की सुनहरी किस्मत लिखी गयी जेलों में बंद देशभक्तों ने सिर्फ एक छोटी सी लेखनी के जरिये अपने देश सेवा के प्रति समर्पण की जो महान गाथाये लिखी परिणाम सामने है आज हम आजाद देश में अपने संविधान के जरिये हर दिन ,हर पल एक नये और विकास की दिशा में बढ़ते हुए नए दिन का अभिनन्दन कर रहे है | वह दौर जबकि पत्रकारिता एक मिशन हुआ करता था तब से लेकर आज के दिन तक में फिर ऐसा क्या हुआ कि कि पत्रकारिता एक मिशन न बन करके व्यवसाय बन चुका है यह ठीक है कि आज प्रेस हो या फिर इलेक्ट्रानिक माध्यम बहुत सी ऐसी खबरों को प्रकाश में लाता है जो समाज तथा नैतिक रूप से लोगो को प्रभावित भी करती है ,बहुत से ऐसे फैसले भी मीडिया की जागरूकता तथा सजगता के कारण अपने मुकाम या मंजिल तक भी पहुंचे जिसने समाज को झकझोर कर भी रख दिया | मगर कुछ मामलो में मीडिया अपनी हद भूल भी रहा है जबकि वह मात्र खबरों कि तह तक जाने के स्थान पर स्वयं निर्णायक कि भूमिका में जाने को आतुर हो जाता है |
यह सच है कि देश बहुत बुरे दौर से गुजर रहा है भ्रष्ट्राचार ,घपले , घोटाले जिस तरह से रोज नए ,नए रूप में सामने आ रहे है उसने तो इस देश की नैतिकता पर ही सवाल खड़े कर दिए है , इस समय विपक्ष को मजबूती के साथ अपनी भूमिका निभानी चाहिए सबसे बड़ी बात की संसद में जब लगातार गतिरोध बना रहेगा तो आम जनता भला इन सांसदों से क्या उम्मीद करे ? इस समय देश के प्रधानमन्त्री के रूप में एक अर्थशास्त्र के जानकर व्यक्ति ने भले ही देश की बागडोर संभाली हो उनके स्वयं के मंत्रिमंडल में तरह -तरह के नैतिक तथा सैद्यान्तिक रूप से भ्रष्ट लोग भरे पड़े है | ऐसे में विदेश नीति क्या हो ? बिना किसी मनमुटाव तथा दवाब के बिना हमें अपनी सर्वश्रेष्ठता सिद्ध करते हुए अपनी समस्याओ को निपटाना पड़ेगा जाहिर है पाकिस्तान जैसे मुल्क से निभाना तलवार की धार पर चलने के बराबर है सरबजीत जैसे मामले को जिस तरह से उठाया गया उसमे सुलझने के भला कितने चांस हो सकते थे पहली बात की बिना सुरक्षा कर्मियों की मुस्तैदी के कोई दूसरे देश की सीमा में कैसे चला गया ? अगर चला भी गया तो उसी समय इस प्रकार के मामले को तुरंत उसी तत्परता से मीडिया ने क्यों नहीं प्रसारित किया तीसरी बात आज भी अनेक कैदी पकिस्तान की जेलों में बंद है उनके लिए क्या किया जा रहा है ? सरबजीत और सुरजीत के नामो में अंतर के कारण कुछ दिनों पहले जिस तरह से पाकिस्तान ने पैतरा बदला उसने तो और भी स्तर पर कई सवाल खड़े कर दिए ? खबरों की सनसनी तथा हर चैनल के एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में पत्रकार अपना धर्म न भूले लोगो के सामने वास्तविकता लाना पत्रकारिता का पहला उद्देश्य होना चाहिए न की चूँकि आपके हाथ में कैमरा है आप हर मुद्दे को भुनाने की होड़ में लग जाये ! शहादत की बात की जा रही है शहीद किसे कहते है ?पहले स्पष्ट कीजिये भावनाओ के उबाल पर किसी भी तमगे की रोटी नहीं सेंकी जाती किस आधार पर भगत सिंह से सरबजीत की तुलना की जा रही है ?हद है देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करने वाले स्वतंत्रता सेनानी से उस व्यक्ति की तुलना करना जो शराब के नशे में किसी और देश की सीमा में पहुंच जाये उसे शहीद की श्रेणी में रखना कितना न्यायसंगत है ? कुछ फैसले जानकार और विद्वान् लोग करे तो बेहतर होगा मुम्बई हमलो के दौरान मेजर उन्निकृष्णन का जान गंवाना शहादत की श्रेणी में आता है | प्रधान मंत्री सडक योजना के दौरान मारे गए इंजीनियर सत्येन्द्र दुबे ,इंडियन ऑइल के ईमानदार कर्मचारी मंजुनाथ की बेरहम हत्या को शहादत की श्रेणी में रखा जा सकता है जिन्होंने देश की सेवा करते हुए अपनी जान दी हर किसी को शहीद की श्रेणी में रखना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है |

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

9 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

chaatak के द्वारा
May 12, 2013

आदरणीय रचना जी सादर अभिवादन, पत्रकारिता कभी राष्ट्रवाद को समर्पित, सत्य और तथ्य को प्रकट करने वाली और किसी भी कीमत पर बेबाक राय देने वाली बेहद पवित्र संस्था थी क्योंकि लोग अच्छे थे रिपोर्टर से लेकर सम्पादक तक को कलम की पवित्रता और पत्रकारिता की शुचिता का अहसास हुआ करता था| वक्त ने करवट बदली और हर एक क्षेत्र में छाये काले पैसे की चकाचौंध ने इसे भी काफी गन्दा धंधा बना दिया है, आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से लेकर प्रिंट मीडिया तक सब धंधा कर रहे है इनसे जिम्मेदार होने की अपेक्षा करना अंधे के आगे रोने जैसा है| अच्छी पोस्ट पर हार्दिक बधाई!

    Alarming Alarm के द्वारा
    May 13, 2013

    कानून-व्यवस्था के योगक्षेम के संवाहक (राजनेता, वकील, पुलिस, न्यायविद), फिल्मकार तथा विशेषकर प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सरीखे अभिजात्यवर्गीय प्रतिनिधियों, आंकलनकर्ताओं एवं मार्गदर्शकों का स्वेच्छाचार ही आगामी जन-क्रांति का आधार बनेगा.

    Rachna Varma के द्वारा
    May 13, 2013

    जी चातक जी , ऐसा नहीं की पत्रकारिता बहुत बुरे दौर में है मेरा स्वयं का मानना है कि रिपोर्ट बनाना और भ्रष्ट्राचार से जुड़े मुद्दे को काफी हद तक सामने लाना जागरूक पत्रकारिता के कारण आज एक ज्वलंत मुद्दा मात्र बना हुआ नहीं वरन सामने भी आ रहे है मगर कुछ मामलो में भावनाओ को जिस तरह भड़काया जाता है वह पूरी तरह से गलत है प्रतिकिया के लिए धन्यवाद

Alarming Alarm के द्वारा
May 9, 2013

कमजोर सरकार, भ्रष्ट सरकारी नीतियों और औसत बुद्धि वाली अपरिपक्व जनता के कारण मीडिया के हौसले निरंकुशता की हद तक बढ़े हुए हैं, मीडिया के हौसले यूँ बढ़ने से उसका अहंकार, आपस में होड़ तथा धन व यश सम्बन्धी लालसाएं बढ़ गई हैं. ऐसा होने पर अब मीडिया सामान्य-असामान्य दोनों घटनाओं को सनसनी के रूप में दिखाने के साथ उनके सम्बन्ध में अपना निर्णय भी प्रस्तुत करके जनता व सरकार के ऊपर दबाव बनाता है. सनसनी पैदा करने वाली सुर्खियों से हमारा अपरिपक्व समाज बेवजह आंदोलित, उद्वेलित व उद्वेगित हो जाता है, परन्तु निकम्मे नेताओ की सरकार को उस दबाव से कुछ विशेष फर्क नहीं पड़ता, बल्कि वह भी निज स्वार्थ पूर्ति (टी.आर.पी. एवं वोटबैंक जुटाने) हेतु आम जनमानस के रुख़ को परखते हुए बहती हवा के अनुसार फैसले लेती है, जिन पर शायद आपके और हमारे जैसे कुछ बुद्धिजीवी हँसते, रोते व अपना आक्रोश प्रकट करते हैं.

    Rachna Varma के द्वारा
    May 10, 2013

    हम बाजारवाद के उस दौर में है जहाँ हर बात में भावनाओं का क्रय -विक्रय किया जा रहा है ऐसे में संयम बनाये रखना बहुत जरुरी , मिडिया को भी अपनी भूमिका को समझना होगा समाज को भी संयमित होना होगा | सार्थक प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद |

nishamittal के द्वारा
May 9, 2013

आपके विचारों से सहमत हूँ रचना जी

    Rachna Varma के द्वारा
    May 10, 2013

    धन्यवाद निशा जी |

bhagwanbabu के द्वारा
May 8, 2013

रचना जी… सबको अपने अपने टी आर पी की चिंता रहती है…. जिसे बढ़ाना जरूरी होता है… सरकार हो या मीडिया… एक आम आदमी की भी अपनी टी आर पी होती है… वो भी उसे बढ़ाना चाहता है…. सबकी नजरो मे आना चाहता है…. . अच्छा लेख…. बधाई… . http://bhagwanbabu.jagranjunction.com/2013/05/05/%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A4%AC%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%A4-%E2%80%9C%E0%A4%B6%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%A6%E2%80%9D-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82/

    Rachna Varma के द्वारा
    May 10, 2013

    भगवान् जी , थोडा समाज को भी परिपक्व बनना होगा | लेख पर सार्थक प्रतिक्रिया के लिए आभार |


topic of the week



latest from jagran