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प्रासंगिकता बढ़ी किसकी भाजपा की या आडवाणी की ? (jagaran junction forum )

Posted On: 12 Jun, 2013 Others में

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किसी भी देश के शासन में सत्ता पक्ष को रास्ते पर लाने के लिए या यूँ कहे एक लोकतान्त्रिक प्रक्रिया की पहली शर्त है की मजबूत विपक्ष पूरी मुस्तैदी के साथ अपने राजधर्म को निबाहे लगातार अपना अंकुश बना कर रखे सत्ता पक्ष पर ताकि मनमाने ढंग से कार्य करने की प्रवृत्ति पर लगाम भी लगे तथा देश की जनता को भी एक मजबूत विपक्ष के रूप में एक ऐसी पार्टी मिल सके जो गलत नीतियों तथा अव्यवस्था को ले कर अपना विरोध दर्ज कराने में सफल हो सके मगर उस देश के बारे में क्या कहा जाये जहाँ भाजपा जैसी प्रमुख विपक्षी पार्टी पूरी तरह से आंतरिक कलह में घिरी हुयी है | इसमें कोई दो राय नहीं की मोदी जैसे विकासपुरुष को आगे लाने का काम किया जा रहा है मगर आडवाणी जैसे बड़े तथा हमेशा पार्टी के लिए सेवा करने वाले एक बेहतरीन राजनीतिक समझ रखने वाले व्यक्तित्व को इस तरह से एक किनारे कर देने पर किसकी प्रासंगिकता कम हुयी है ? जिस पार्टी को वाजपेयी तथा आडवाणी ने मिल कर बड़ा किया हो क्या उसके लिए यह शर्म की बात नहीं है की उसके सबसे वरिष्ठ तथा योग्य नेता को को इस कदर अपमानित होना पड़ा की उन्हें अपने इस्तीफे के अलावा कोई रास्ता दिखाई नहीं दिया जिस पार्टी में इस तरह का अन्तर्विरोध हो उसे देशहित की क्या चिंता होगी प्रधानमन्त्री पद की दावेदारी क्षेत्रीय दल के नेता दावे के साथ कर सकते है मगर वही आडवाणी को नसीहत दी जा रही है की अपने उम्र को देखे दुर्भाग्य तो यह है कि इस तरह वैमनस्य तथा घृणा कि बाते फ़ैलाने में सोशल साइट्स तथा ट्विटर का सहारा लिया जा रहा है | कुछ गलती तो आडवाणी जी कि भी है कि उन्हें यदि प्रधानमन्त्री पद कि इच्छा है तो यह बात पार्टी के अन्दर सभी को क्यूँ नहीं पता है और जिस तरह से वाजपेयी जी को पीएम बनवाने में उनकी भूमिका थी उसी आधार पर उन्हें एक जुझारू नेता कि तरह अपनी छवि को बनाये रखना था | भले ही बाबरी विध्वंस के बाद हिन्दू वोट बैंक बढ़ा हो और इतना कि कांग्रेस का सूपड़ा ही साफ हो गया हो मगर देश कि राजनीति में लगातार अपनी पैठ बनाये रखने के लिए विकास के नए आयाम गढ़ने होंगे इस काम में नरेन्द्र मोदी ने अपनी भूमिका को बखूबी निभाया है और यही वजह है कि आज मोदी एक विकास पुरुष कि भांति नजर आ रहे है | सबसे बड़ी बात की किसी भी पार्टी के लिए आंतरिक गठबंधन का मजबूत होना तथा सहयोगी दलों को साथ ले कर चलना यह समय की मांग है इसके लिए वरिष्ठता तथा अनुभव दोनों होना चाहिए इसलिए मोदी भले ही आज के दौर में प्रासंगिक हो चुके हो आडवाणी जी को अप्रासंगिक नहीं कहा जा सकता और यह बात भाजपा को जितना शीघ्र समझ में जाये वह उसके हित के लिए है वर्ना वह दिन दूर नहीं की बड़ा विपक्ष और और सत्ता पक्ष दोनों एक किनारे बैठे होंगे और क्षेत्रीय दल जोड़ तोड़ करके देश की बागडोर संभालने की भूमिका में आ जायेंगे और वह समय इस देश के लिए बेहद घातक होगा क्योंकि मामूली खेल तथा अन्य किसी भी मंत्रालय की जिम्मेदारी मिल जाने पर जिस तरह से लूट मचती है उसके बारे में ज्यादा क्या लिखना इसलिए अपनी भूमिका के प्रति जवाबदेह बने पार्टी यह देश हित के लिए होगा |

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

priti के द्वारा
June 16, 2013

आदरणीय रचना जी ,मेरे हिसाब से ,बीजेपी ने अडवाणी जी को दरकिनार कर अपनी ही प्रासंगिकता कम की है .और अडवाणी जी ने भी बड़प्पन न दिखा कर अपनी ही प्रासंगिकता कम की है ,गए दिनों जो भी हुआ उससे आम जनता बीजेपी से निराश और हताश ही हुई है . सार्थक और पठनीय पोस्ट के लिए आपको हार्दिक बधाई !

    Rachna Varma के द्वारा
    June 17, 2013

    जी प्रीति जी ,प्रासंगिकता तो सच में दोनों की ही कम हुयी है , क्योंकि दोनों ने ही न तो पार्टी हित न तो देश हित के बारे में सोचा और अपने अहं के चलते अपनी ही प्रासंगिकता कम कर ली , लेख पढने तथा उत्साह वर्धन के लिए धन्यवाद ….

bhagwanbabu के द्वारा
June 15, 2013

रचना जी … बहुत ही अच्छा प्रश्न उठाया है आपने अपने लेख के माध्यम से… मेरी कहिए तो … प्रासंगिकता दोनो की कम हुयी है… भाजपा की भी और आडवाणी की भी… . धन्यवाद..

    Rachna Varma के द्वारा
    June 17, 2013

    जी भगवान जी बड़ी तथा प्रमुख विपक्षी पार्टी होने के बावजूद भाजपा का रवैया कही से भी बुद्धिमत्ता पूर्ण तो ही है इसलिए प्रासंगिकता किसी की भी नहीं बढ़ी बल्कि पार्टी और सिमट गयी धन्यवाद …

s.p.singh के द्वारा
June 15, 2013

रचना जी आपके लेख में एक जागरूक नागरिक की पीड़ा भी है और इस विषय में मेरा भी यही विचार है ? पोरबंदर की एक अदालत ने गुजरात राज्य के जल-संसाधन मंत्रालय के कैबिनेट मंत्री (श्री) बाबु भाई खैरिया को वर्ष 2006 में पंजीकृत अवैधानिक रूप से माइनिंग करने के अपराध में तीन वर्ष की कैद की सजा सुनाई है, यह उस समय की घटना है जब वह न तो मंत्री थे और न ही विधायक लेकिन गैर कानूनी रूप से माइनिंग करते थे अपराध दर्ज होने के बाद ही मंत्री बने और अब अदालत ने उन्हें जेल का रास्ता दिखा दिया है क्या यही गुड गवर्नेस की निशानी है / इसी प्रकार एक और चर्चित गुजरात के भूतपूर्व मंत्री जिसको अदालत ने गुजरात से प्रदेश बदर ( तड़ी पार ) किया हुआ है आज कल उत्तर प्रदेश में पार्टी को सत्ता दिलाने के लिए जुटे हुए है – तीसरी घटना को हुए अभी अधिक दिन नहीं हुए है जहाँ गुजरात की एक अदालत ने एक महिला मंत्री को 2002 के दंगो के अपराध में महती भूमिका के कारण उन्हें 28 वर्षो की सजा दी है ? अगर हम मान भी ले की कांग्रेस भ्रष्टाचार में डूबी हुयी है तो उसके स्थान पर जो पार्टी जोर शोर से सत्ता हथियाने की कोशिस कर रही है क्या वह अपराधियों के बल पर शासन करेगी? जनता भ्रमित नहीं होगी तो क्या करेगी – एस० पी० सिंह, मेरठ

    Rachna Varma के द्वारा
    June 17, 2013

    आदरणीय सिंह जी , दरअसल इस तरह की परिस्थितियों में एक जुटता बहुत जरुरी है और इसी का अभाव प्रत्यक्ष दिख रहा है धन्यवाद

anilkumar के द्वारा
June 15, 2013

आदर्णीय रचना जी , आडवाणी को तो आर. एस. एस ने ही सन 2005 में ही अप्रसांगिक कर दिया  था , जब जिन्ना पर उनके एक बयान पर बिना उनका कोई स्पष्टीकरण सुने खुले आम आलोचनाओं  की बोछार कर दी गई थी । उस समय आर. एस. एस. और तत्कालीन संघ प्रमुख का आडवाणी के  प्रति व्यवहार अत्यंत अप्रत्याशित था । ो

    Rachna Varma के द्वारा
    June 17, 2013

    आदरणीय अनिल जी किसी भी पार्टी के वरिष्ठ नेता के बचाव में पूरी पार्टी को एक जुट होना चाहिए और यही दुर्भाग्य है कि निजी स्वार्थ के चलते एक वरिष्ठ नेता के साख पर भी प्रश्न चिन्ह लग गया धन्यवाद |

jlsingh के द्वारा
June 13, 2013

सबसे बड़ी बात की किसी भी पार्टी के लिए आंतरिक गठबंधन का मजबूत होना तथा सहयोगी दलों को साथ ले कर चलना यह समय की मांग है इसके लिए वरिष्ठता तथा अनुभव दोनों होना चाहिए इसलिए मोदी भले ही आज के दौर में प्रासंगिक हो चुके हो आडवाणी जी को अप्रासंगिक नहीं कहा जा सकता और यह बात भाजपा को जितना शीघ्र समझ में जाये वह उसके हित के लिए है वर्ना वह दिन दूर नहीं की बड़ा विपक्ष और और सत्ता पक्ष दोनों एक किनारे बैठे होंगे और क्षेत्रीय दल जोड़ तोड़ करके देश की बागडोर संभालने की भूमिका में आ जायेंगे और वह समय इस देश के लिए बेहद घातक होगा क्योंकि मामूली खेल तथा अन्य किसी भी मंत्रालय की जिम्मेदारी मिल जाने पर जिस तरह से लूट मचती है उसके बारे में ज्यादा क्या लिखना इसलिए अपनी भूमिका के प्रति जवाबदेह बने पार्टी यह देश हित के लिए होगा | हम आप यानी आम जनता तो सलाह ही दे सकती है वे लोग भी पढ़े लिखे अनुभवी और समझदार हैं पर ईगो की लड़ाई में सब कुछ गँवा बैठते हैं. राजनाथ सिंह भी आजकल ज्यादा सक्रियत दिखलाने लगे हैं, ऐसा मुझे लगता है. संतुलित आलेख के लिए बधाई!

    Rachna Varma के द्वारा
    June 13, 2013

    प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद


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