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प्रकृति का रुदन

Posted On: 26 Jun, 2013 Others में

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विवेकशील मानव ने भला किसे बख्श दिया !
जी भर कर लूटा जिसने उसे भरपूर दिया |
फिर वह चाहे नारी हो या हो अद्भुत प्रकृति |
दोहन की यह सतत प्रक्रिया |
पहाड़ो से ले कर जंगल तक कुछ न बचा |
पाप करके उसे कभी गंगा में धोने की लालसा |
तो कभी बद्री ,केदार के नाम पर धाम की लालसा |
हर चीज को व्यापार बना दिया |
पैसे की भूख के आगे कभी सुनी तुमने पहाड़ो की क्रन्दन ?
रो रही है प्रकृति संभल जा अभी भी नादाँ !
उसके आंसुओ के बाढ़ में सब कुछ बहेगा |
रोक दो विकास के नाम पर विनाश की तैयारी |
छोड़ दो वनों , जंगलो और पहाड़ो को रे मूर्ख मानव !
प्रकृति के इस सौन्दर्य को मत बेच बाजार में |
मंहगी पड़ेगी तुझे अपनों के साथ की जाने वाली होशियारी |
मांग क्षमा पहाड़ो के देवता से न रौंद अब तू उन्हें अपनी कामना से|

(उत्तराखंड में भयानक आपदा ने जैसे हम सभी को एक चेतावनी दी है , प्रकृति के इतने खिलाफ जा कर हम किसका भला कर रहे है |उपर्युक्त भावाभिव्यक्ति कविता तो नहीं यह मेरे अंतर्मन में उठे कुछ उद्गार है जिन्हें कलमबद्ध करने की कोशिश की है )

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rachna Varma के द्वारा
July 1, 2013

प्रीति जी हर संवेदनशील मनुष्य इस आपदा से विचलित हुआ है ,इसलिए भावनाए सभी की मुखर हो गयी धन्यवाद

priti के द्वारा
June 29, 2013

बहुत ही अच्छे उदगार हैं ….आपने सही शब्दों में सही बात कही है , हार्दिक बधाई !रचना जी…

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
June 29, 2013

जी भर कर लूटा जिसने उसे भरपूर दिया | फिर वह चाहे नारी हो या हो अद्भुत प्रकृति | दोहन की यह सतत प्रक्रिया | आदरेया रचना जी सुन्दर वक्तव्य ..सटीक …इंसान बड़ा स्वार्थी होता जा रहा है भविष्य की सोच खत्म है बस शोर्ट कट ..तुरंत लाभ ..तो भोगना भी तो है कौन बचा सकता है … भ्रमर ५

    Rachna Varma के द्वारा
    July 1, 2013

    आदमी का स्वार्थ और लालच दोनों ही उसे तबाही की ओर ले जा रहे है | धन्यवाद

ashishgonda के द्वारा
June 29, 2013

आदरणीया रचना वर्मा जी! बहुत ही हृदयस्पर्शी रचना… इतिहास गवाह है कि अगर देवता तो क्या स्वयं देवराज भी कुपित हो जाए तो कोई कृष्ण एक पर्वत के सहारे अपने पूरे गोकुल की रक्षा कर सकता है, परन्तु यहाँ तो पर्वत ही कुपित है…….

    Rachna Varma के द्वारा
    July 1, 2013

    विचारो से सहमति के लिए आभार |

bhagwanbabu के द्वारा
June 28, 2013

सही कहा आपने  अपनी सुन्दर रचना के माध्यम से… बधाई..

    Rachna Varma के द्वारा
    July 1, 2013

    प्रकृति के साथ मनमानी का खामियाजा भी आखिर कौन भुगतेगा धन्यवाद |


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