सीधी बात

सुलझी सोच, समग्र विकास

103 Posts

871 comments

Rachna Varma


Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.

Sort by:

यह वो हकीकत है जो निगाहों से बयाँ होती है

Posted On: 13 Feb, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

Others में

3 Comments

परिवर्तन की ओर बढ़ता हुआ भारत

Posted On: 10 Feb, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

Others में

2 Comments

पथेर पांचाली जीवन और रिश्तो का सजीव चित्रण

Posted On: 30 Jan, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

1 Comment

यह धरती है राम कृष्ण की

Posted On: 25 Jan, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

2 Comments

जाने वालो की याद क्यों आती है

Posted On: 23 Jan, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

6 Comments

हम कोस चुके सनम

Posted On: 21 Jan, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 4.50 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

1 Comment

कुछ बाते ,कुछ यादे

Posted On: 18 Jan, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

2 Comments

हम दोस्ती का दम भरे वे पीठ पर वार करे

Posted On: 13 Jan, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

Others में

0 Comment

Page 4 of 11« First...«23456»10...Last »

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

रचना जी आपके लेख में एक जागरूक नागरिक की पीड़ा भी है और इस विषय में मेरा भी यही विचार है ? पोरबंदर की एक अदालत ने गुजरात राज्य के जल-संसाधन मंत्रालय के कैबिनेट मंत्री (श्री) बाबु भाई खैरिया को वर्ष 2006 में पंजीकृत अवैधानिक रूप से माइनिंग करने के अपराध में तीन वर्ष की कैद की सजा सुनाई है, यह उस समय की घटना है जब वह न तो मंत्री थे और न ही विधायक लेकिन गैर कानूनी रूप से माइनिंग करते थे अपराध दर्ज होने के बाद ही मंत्री बने और अब अदालत ने उन्हें जेल का रास्ता दिखा दिया है क्या यही गुड गवर्नेस की निशानी है / इसी प्रकार एक और चर्चित गुजरात के भूतपूर्व मंत्री जिसको अदालत ने गुजरात से प्रदेश बदर ( तड़ी पार ) किया हुआ है आज कल उत्तर प्रदेश में पार्टी को सत्ता दिलाने के लिए जुटे हुए है - तीसरी घटना को हुए अभी अधिक दिन नहीं हुए है जहाँ गुजरात की एक अदालत ने एक महिला मंत्री को 2002 के दंगो के अपराध में महती भूमिका के कारण उन्हें 28 वर्षो की सजा दी है ? अगर हम मान भी ले की कांग्रेस भ्रष्टाचार में डूबी हुयी है तो उसके स्थान पर जो पार्टी जोर शोर से सत्ता हथियाने की कोशिस कर रही है क्या वह अपराधियों के बल पर शासन करेगी? जनता भ्रमित नहीं होगी तो क्या करेगी - एस० पी० सिंह, मेरठ

के द्वारा:

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

सबसे बड़ी बात की किसी भी पार्टी के लिए आंतरिक गठबंधन का मजबूत होना तथा सहयोगी दलों को साथ ले कर चलना यह समय की मांग है इसके लिए वरिष्ठता तथा अनुभव दोनों होना चाहिए इसलिए मोदी भले ही आज के दौर में प्रासंगिक हो चुके हो आडवाणी जी को अप्रासंगिक नहीं कहा जा सकता और यह बात भाजपा को जितना शीघ्र समझ में जाये वह उसके हित के लिए है वर्ना वह दिन दूर नहीं की बड़ा विपक्ष और और सत्ता पक्ष दोनों एक किनारे बैठे होंगे और क्षेत्रीय दल जोड़ तोड़ करके देश की बागडोर संभालने की भूमिका में आ जायेंगे और वह समय इस देश के लिए बेहद घातक होगा क्योंकि मामूली खेल तथा अन्य किसी भी मंत्रालय की जिम्मेदारी मिल जाने पर जिस तरह से लूट मचती है उसके बारे में ज्यादा क्या लिखना इसलिए अपनी भूमिका के प्रति जवाबदेह बने पार्टी यह देश हित के लिए होगा | हम आप यानी आम जनता तो सलाह ही दे सकती है वे लोग भी पढ़े लिखे अनुभवी और समझदार हैं पर ईगो की लड़ाई में सब कुछ गँवा बैठते हैं. राजनाथ सिंह भी आजकल ज्यादा सक्रियत दिखलाने लगे हैं, ऐसा मुझे लगता है. संतुलित आलेख के लिए बधाई!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

अभी -अभी मैंने एक लेख पढ़ा पूरी व्यवस्था है कि कानून के अनुसार चल कर इस समस्या या फिर जो भी समस्या हो उससे निबटा जाये मगर यह हमारा दुर्भाग्य है कि बौद्धिक तथा जानकर लोग हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में कम होते जा रहे है उस पर से राजनितिक आरोप -प्रत्यारोप ने समस्याओ को और भी जटिल बना दिया है | दूसरी बात सख्ती जहाँ जरुरी हो वहां पर लागू करने में कोई बुराई नहीं है ,बेकसूर तो हर हाल में मर रहे या तो नक्सलवादियो द्वारा या फिर गलत नीतियों कि वजह से जानकारी के लिए बता दे 1984 में एक महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व को हमने खोया था जो बेहद कुशल शासन संचालक तथा विदेश नीति की जानकार और दृढ तथा सही फैसला लेने में शीघ्रता करने वाली बेहद सक्षम ,सशक्त तथा दृढ इच्छाशक्ति वाली महिला थी

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

कमजोर सरकार, भ्रष्ट सरकारी नीतियों और औसत बुद्धि वाली अपरिपक्व जनता के कारण मीडिया के हौसले निरंकुशता की हद तक बढ़े हुए हैं, मीडिया के हौसले यूँ बढ़ने से उसका अहंकार, आपस में होड़ तथा धन व यश सम्बन्धी लालसाएं बढ़ गई हैं. ऐसा होने पर अब मीडिया सामान्य-असामान्य दोनों घटनाओं को सनसनी के रूप में दिखाने के साथ उनके सम्बन्ध में अपना निर्णय भी प्रस्तुत करके जनता व सरकार के ऊपर दबाव बनाता है. सनसनी पैदा करने वाली सुर्खियों से हमारा अपरिपक्व समाज बेवजह आंदोलित, उद्वेलित व उद्वेगित हो जाता है, परन्तु निकम्मे नेताओ की सरकार को उस दबाव से कुछ विशेष फर्क नहीं पड़ता, बल्कि वह भी निज स्वार्थ पूर्ति (टी.आर.पी. एवं वोटबैंक जुटाने) हेतु आम जनमानस के रुख़ को परखते हुए बहती हवा के अनुसार फैसले लेती है, जिन पर शायद आपके और हमारे जैसे कुछ बुद्धिजीवी हँसते, रोते व अपना आक्रोश प्रकट करते हैं.

के द्वारा: Alarming Alarm Alarming Alarm

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

श्रद्धेया रचना जी, आपके आलेख में सकारात्मकता पर किये गए आपके मनन का प्रतिबिम्ब झलक रहा है । बड़े सटीक और स्पष्ट विचार प्रकट किये हैं आप ने । यदि हम आस-पास नज़र दौड़ाकर जीवन में सफ़लता की ऊँचाइयाँ प्राप्त करने वाले स्त्री-पुरुषों पर गौर करें, तो पाएंगे कि लगभग 99 प्रतिशत सफ़ल लोग जीवन के हर पहलू के प्रति सकारात्मक नज़रिया रखने वाले लोग हैं । सकारात्मकता का चरित्र जहाँ धनात्मक होता है, वहीं नकारात्मकता ॠणात्मक होती है । स्पष्ट है कि सकारात्मक व्यक्तित्व का स्वामी हर मामले में धनी होगा, जबकि जीवन के प्रति नकारात्मक नज़रिये वाला ॠणभार के साथ जीने को अभिशप्त होगा । वातावरण को नकारात्मक बनाना जितना आसान होता है, सकारात्मक बनाना उतना ही कठिन । ये सारे सिद्धान्त लगभग एक जैसे हैं, जैसे शाश्वत नियमों के साथ बँधे हों । विध्वंस सेकंडों में होता है, जबकि निर्माण महीनों और वर्षों में । समस्या ये है कि इन परम सच्चाइयों का ज्ञान प्राप्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसे आचरण में आत्मसात कर व्यावहारिक जीवन में उतारना होता है । यह अभ्यास श्रमसाध्य एवं अटूट धैर्य की अपेक्षा रखता है, जबकि आज हम हर मामले में एक अदद शार्टकट की तलाश में मृग की भाँति तपते रेगिस्तानों में भटक रहे हैं ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

एक अजीब आपाधापी मची है कि हर कोई किस तरीके से कितना ज्यादा कमा सकता है ज्यादा पैसा कमाने के लोभ ने हर व्यक्ति को विवेक शून्य बना दिया है किसी के पास सही गलत को मापने का वक्त नहीं है अपने बड़े होते बच्चो को समय देने का वक्त नहीं बचा है और टेक्न्लाजी की तरक्की ने पूरा कोक शास्त्र खोल कर रख दिया है जाहिर है औरत और उसके शरीर से जुड़े रहस्यों को जानने की बाल जिज्ञासा बढती जा रही है युवा होते बच्चो को इधर-उधर से आधी -अधूरी जानकारी से विकृत मानसिकता का जन्म होने लगा है और नतीजा छोटी ,मासूम बच्चियां भी आज सुरक्षित नहीं है | एक जो दूसरा बड़ा परिवर्तन देखने में आ रहा है वह है कि अब पहले के जैसे गाँव नहीं रहे गाँवो में लोग नहीं रहे जहाँ एक खुला खेत खलिहान हुआ करता था और बच्चे पेड़ो पर चढ़ कर या दौड़ -भाग करके अपना समय गुजारते थे अब तो हर कोई बड़े मेट्रोपोलिन शहरों कि ओर भाग रहा है और घर का कोई भी सदस्य यदि काम-धंधे में लग गया है तो उसके लिए आसान होता है कि अपने रिश्तेदार या नातेदार को भी बुला कर रखे सभी नहीं मगर ज्यादातर मामलो में छोटे शहर तथा गाँव से आये युवा भी इन बड़े शहरो का खुलापन तथा तेजी से भागती -दौड़ती जिन्दगी को देख कर उसकी चकाचौंध में गलत रस्ते पर चल पड़ते है मुंबई जैसे शहर की बात यदि हम करे तो यहाँ हर दूसरा युवक फिल्मो में किस्मत आजमाने आता है उन्हें फिल्मो में कोई काम मिले या न मिले वे या तो अपराध की दुनिया का रास्ता पकड लेते है या फिर ऐसे गलत कामो में उलझ जाते है जिसके चलते मात्र बच्चियां ही नहीं वरन बड़ी ,बुजुर्ग महिलाये भी इनकी शिकार बन जाती है इसलिए पहनावे ओढ़ावे को दोष देने का कोई मतलब नहीं है सुन्दर सामाजिक आलेख आदरणीय रचना जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

हाय बेचारी धर्मपत्नी कितनी खुश हो जाएगी बस एक दिन के लिए गुस्से को छुट्टी दे दीजिये फिर देखिये आपका दिन कितना बढ़िया गुजरता है | फर्ज कीजिये आपके बेटे या बेटी का रिजल्ट बहुत अच्छा नहीं आया गुस्साने की जगह उससे कहिये अरे बेटा तुम तो रिजल्ट ला कर कम से कम दिखा रहे हो अपना रिजल्ट तो कभी हमने अपने माँ -बाप को दिखाने का झंझट ही मोल नहीं लिया !! वह तो जब कालेज का नया सत्र शुरू होता था तो एक ही क्लास में दुबारा जाने पर घर वालो को शक होता था की कमबख्त पिछले साल भी तो इसी क्लास में था हाय अपना कलेजे का टुकड़ा पास भी न हुआ ! सुन्दर लेख ! ये बात बिलकुल सही है की गुस्सा काबू हो जाए तो बहुत बड़ी बात है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: sonam saini sonam saini

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

क्योंकि अब लगता है कि किस तरह से सारे रिश्ते नाते को सहेजते हुए बिना किसी सख्ती किये हुए हम भाई बहनों कि देख -भाल की यही बहुत होगा कि उनके जैसा सहनशील और धर्मपरायण और कर्त्तव्य परायण बन सके खैर यह तो रही मेरी निजी जानकारी अब बात करते है नेताओ की राहुल बाबा की बात करे तो सच में कांग्रेस के अंदर ही चम्मचो और जी हजूरी करने वालो की लंबी फ़ौज है उन्हें याद करना है तो इंदिरा गाँधी जैसी शख्सियत को याद करे उनके जैसी कूटनीतिक तथा राजनीतिक छवि वाली सशक्त महिला को याद रखे अपने पिता राजीवगांधी को याद रखे जो बहुत सीधे और सरल थे जो इस देश की छवि बदलना चाहते थे लेकिन किस तरह से उनकी हत्या कर दी गयी इसलिए वे ध्यान रखे की सच में राजनीती “काजल की कोठरी ” है जिसमे दाग लगाये जाते है इस लिए जीहजुरी करने वालो से सजग रहने की जरुरत है ये कांग्रेस की संस्कृति रही है ! सार्थक और स्पष्ट लेखन !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

पश्चिमी देशो में उपयोग और उपभोग < के बीच का अंतर ख़त्म हो चुका है हम संसाधनो से ले कर निजी जिन्दगी के प्रतिदिन होने वाले व्यय का लेख जोखा यदि करे तो हम पाएंगे कि यह समस्या एक विकराल रूप धारण करती जा रही है यहाँ अपने देश अर्थात इंडिया का भी यही हाल है हमने अपनी अंतरात्मा कि आवाज सुननी छोड़ दी है मां -बाप ,बाबा -दादी ,नाना -नानी बुआ ,चाचा जैसे रिश्ते अपना अर्थ खोते जा रहे है कहावत है कि काठ कि ननद सताती है अर्थात यह एक पारिवारिक अंकुश है जहाँ बुआ का पद बड़ा होता है उन्हें सम्मान दिया जाता है जब परिवार टूटता है तो उसका खामियाजा सिर्फ बच्चो को नहीं समाज को भी भुगतना पड़ता है हम भी धीरे धीरे अपनी संस्कृति और अपने संस्कार भूलकर पशिम का अन्धानुकरण कर रहे हैं ! अगर यही चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब भारत में भी इस तरह की घटनाएं होने लगें ! लेकिन फिर भी मैं इतना जरुर कहूँगा की भारत के माता पिता , बाहर से कितने भी विदेशी हों , अन्दर से भारतीय ही हैं !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

आदरणीय रचना जी, सादर ! "" आखिर इस यथार्थ का सामना हममे से हर एक को करना ही चाहिए कि जितनी क्षमता हमारी है हम बस उस सीमा तक ही जा सकते है अपने सामर्थ्य से ज्यादा कि चाहत रखना सिवाय तकलीफ और गलत रस्ते पर चलने के अलावा कुछ भी नहीं हो सकता"" बिलकुल ठीक कहा आपने ! बस एक उदाहरण देना चाहूंगा की आज की युवा पीढ़ी अपने रोल माडलों की नक़ल में उनके जैसे कपडे पहन लेती है, उनके जैसी हेयर स्टाइल बना लेती है, पर उनके जैसा परिश्रम नहीं करती ! चाहे किसी भी क्षेत्र का नामचीन व्यक्ति हो, उस स्थान पर पहुँचने के लिए उसने कितना परिश्रम किया है, उस परिश्रम का वे अनुकरण नहीं करते ! बस निरर्थक सपने देखना शुरू कर देते हैं ! बहुत सार्थक संदेस देती रचना !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

रचना जी सादर नमस्कार, आपने बहुत ही छोटे में विपक्ष की कमियों को उजागर करने का प्रयत्न किया है.किन्तु यदि ये इमानदारी से विपक्ष की भूमिका निभायेंगे तो इनके घोटालों का क्या होगा देश की खदानों में लूट क्या सिर्फ कांग्रेस के सहयोगी ही कर रहे हैं विपक्ष के सहयोगी नहीं? यदि विपक्ष ने आवाज उठायी तो क्या फिर ये खदानों में लूट कर सकेंगे? क्या प्रमुख विपक्षी दल को संसद में बैठे अन्य दल समर्थन देंगे? इसकी बानगी अभी राज्यसभा में देखने को मिली जब वोटिंग के समय एक दल के सारे सदस्यों ने विपक्ष का साथ देने से बेहतर सदन से बाहर जाना उचित समझा. इसलिए मेरा मानना है की कमजोर विपक्ष से अधिक उम्मीद करना भी बेईमानी है.

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: nishamittal nishamittal

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा:

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

‎'जो भरा नहीं है भावों से जिसमें बहती रसधार नहीं। वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।' आपको गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई … 26 जनवरी आने वाला है, यह दिन सम्पूर्ण भारत में गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है. 26 जनवरी 2012 से ठीक 22645 दिन पूर्व 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू किया गया था. बताया जाता है की पुरे विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ का गणतंत्र सबसे विशाल है. इस दिन को पुरे भारत में बड़े हर्षोल्लास के साथ एक राजकीय त्यौहार के रूप में मनाया जाता है. ज्ञातव्य हो की हमारे संविधान को 211 विद्वानों द्वारा 2 महीने और 11 दिन में पूरा किया गया था. इस संविधान को 25 नवम्बर 1949 को मंजूरी मिली थी और 24 जनवरी 1950 को सभी सांसदों, विधायकों और अन्य मंत्रियों द्वारा हस्ताक्षर किये जाने के उपरांत ही 26 जनवरी 1950 को पूर्णरूपेण भारत में लागू किया गया था. इन जंजीरों की चर्चा में कितनों ने निज हाथ बँधाए, कितनों ने इनको छूने के कारण कारागार बसाए, इन्हें पकड़ने में कितनों ने लाठी खाई, कोड़े ओड़े, और इन्हें झटके देने में कितनों ने निज प्राण गँवाए! किंतु शहीदों की आहों से शापित लोहा, कच्चा धागा। एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो। आज देश है मांग रहा वीरों की आहुतियाँ फिर ,, वीर भगत आजाद विस्मिल की आत्मा व्याकुल फिर,, देश युवावों का ही है वह ही इसका भविष्य रचें ,, वीर सुभाष हैं पथ दर्शक फिर से एक इतिहास रचें,, देश विश्व में आलोकित हो गौरव इसका फिर वापस आये,, करें कर्म कुछ ऐसा हम भारत स्वर्णिम आभा से रंग जाए,, गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामना ….. जय हिंद वंदे मातरम माँ तुझे प्रणाम माँ तुझे सलाम वंदे मातरम ch.sanjeev tyagi (kutabpur waley) 33,gazawali roorkee road muzaffar nagar 2-Add. Gav----kutabpur po.-----Barla Di.........muzaffarnagar U.P 08802222211 Delhi 09457392445 Muzaffar nagar 09760637861 ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

के द्वारा:

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा:

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा:

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

रचना जी मेरी रचना के बारे में ये आश्चर्य की बात नहीं तो और क्या है कोई एक मुद्दा हो तो लिखूं न क्या स्पष्ट कर दूं ये ५ भाग में है और पाँचों का भाव अलग अलग है लगता है आप शीघ्रता में थी कृपया एक बार फिर से पढ़ें और हर भाव का अलग अलग अर्थ समझें जहाँ दिक्कत हो कृपया लिखें कुल मिला कर आप ये समझ लें इसका आशय यह है की हमें उनसे ज्यादा तकलीफ नहीं होती जो रोज वही करते घूमते हैं जिनका वही गुण है या जिससे आप अच्छे की उम्मीद ही नहीं कर सकती लेकिन जिसका गुण अच्छा है जिससे आप प्यार करती हैं जिनको आप दिल में बसाये हैं आँखों में सजाये हैं उनसे विरुद्ध व्यव्हार या रुखापन अपेक्षा के खिलाफ आचरण मिले तो हमें आप को किसी को भी बर्दाश्त नहीं होता आशा है आप को अब स्पष्ट हो गया होगा अगर अब भी कोई दिक्कत आये तो मुद्दे पर बात करें धन्यवाद

के द्वारा:

के द्वारा: nishamittal nishamittal

रचना जी आज तक भारत का रुख किस विचार पर स्पष्ट रहा है जो आज स्पस्ट होगा भारत सदैव ही अपनी रक्छा हेतु दूसरों के आगे के दामन फैलाता रहा है कारगिल जिस पर हम गर्व करते हैं या शास्त्री जी के समय की पाकिस्तान की विजय ,,दोनों ही जहां हर्ष देतें हैं वहीं हमे विषाद से भी भर देते है कारगिल युद्ध हमने अपनी आत्म रक्छा हेतु लड़ा था जब आपको कोइ घर में घुस कर मारता है तो विवशता में प्रतिकार करना पड़ता है कारगिल में हमारे राजनयिकों ने यही किया शास्त्री जी के समय हम कूटनीतिक मंच पर पराजित हो गये और हमे देश की एक महत्वपूर्ण निधि से हाथ धोना पड़ गया चीन का हश्र तो सबको पता है सारी समस्याएं जस की तस हैं हम आज भी उनसे जूझ रहे हैं ६३ सालों से देश अपनी दिशा तय कर रहा है परन्तु अफ़सोस आज तक नही कर पाया आगे भविष्य में जब तक दृढ़ नेत्रित्व देश की कमान नही संभालता मुझे नही लगता स्थितियों में कोइ परिवर्तन आने की संभावना है ..............जय भारत

के द्वारा:

  आद. रचना जी, वही बात। समय तथा परिस्थिति तो स्‍त्री-पुरुष दानों को प्रभावित करती है। स्‍त्री पात्रों की बात क्‍या स्‍त्री साहित्‍यकारों को देखिए। सभी भूमिकायें बखूबी निभाई हैं। हाई स्‍कूल- इंटर के दिनों में स्‍व. गौरा पंत \'शिवानी\' से बहुत प्रभावित था। कवियों में दिनकर जी हृदय में छाये थे। भले ही अपेक्षित मान्‍यता न मिली हो , पर मेरा मानना है कि शिवानी का हिंदी के कथा साहित्‍य में विशिष्‍ट स्‍थान है। खास कर संस्‍मरात्‍मक लेखन में उनका स्‍थान शीर्षस्‍थ है। मैं अपने गांव से लखनऊ उनसे मिलने भी गया था। बाद जानकारी हुई उनके लेखन की तरह ही उनका निजी व गार्हस्‍थ जीवन भी शानदार था। पुत्री,पत्‍नी और मां के रूप में उच्‍च संस्‍कारी और आदर्श। इन अनिवार्य दायित्‍व निर्वहन के साथ ही लेखन।  स्‍त्री- मनोदशा और स्थिति के बारे में बांग्‍ला साहित्‍यकार आशा पूर्णा देवी पढने लायक हैं। आपन न पढा हो तो जरूर पढें। खासकर ज्ञानपीठ पुरष्‍कृत \'प्रथम प्रतिश्रुति\' और \' बकुल कथा\'। इस कडी के तीसरे उपन्‍यास का नाम याद नहीं आ रहा। काफी पहले पढा था। इनमें स्‍त्री की तीन पीढियों की यात्रा का चित्‍ताकर्षक चित्रण है।  स्‍त्री को अलग इकाई और बेचारी के रूप में देखने के बजाय शिक्षा और आर्थिक आत्‍म निर्भरता की आवश्‍यकता है। बाकी सब ठीक है।

के द्वारा:

रचना जी, जब कोई भाषा-शिल्‍प सम्‍पन्‍न लेखक-लेखिका किसी साहित्‍यकार की रचनाओं को इस तरह सम्‍मान देता है तो वह अपने घोषित उद्देश्‍य से इतर अनायास ही बडी साहित्‍य सेवा भी कर जाता है। आपके इसे भाव-प्रयास को प्रणाम करते हुए किंचित असहमति के साथ कहना चाहता हूं कि- - नारी क्‍या पुरुष मन को भी समझ पाना भी ऐसे ही दुष्‍कर होता है। मन स्‍त्री का हो या पुरुष का संसार -प्रपंच की ही तरह रहस्‍यमयी होता है। हम स्‍व मन को कब समझ पाते हैं। फिर , अब यह मान्‍यता भी रूए हो चली है कि स्‍त्री में पुरुष और हर पुरुष में स्‍त्री न्‍यूनाधिक्‍य रूप से होती है। - 'बूढी काकी' स्‍त्री मनोभाव की निदर्शक नहीं , स्‍वार्थलिप्‍स रिश्‍तों के उतार चढाव की प्रतीक है। तमाम सामाजिक परिवर्तनों के बावजूद यह क्षुद्र वृत्ति आज भी यत्र तत्र सर्वत्र देखने को मिल जाती है। और , इस अर्थ में यह कहानी आज भी प्रासंगिक है और रहेगी। 'बूढी काकी' के बजाय कथा सम्राट ने किसी बूढे काका या बाबा-दादा को पात्र बनाया होता तो भी ऐसा ही परिघटित होता। धन-जमीन पाने के बाद बुढापे की लाठी का भाव व भूमिका बदल ही जाती है। दूसरे बुढापे का कैसे बच्‍चों जैसा हो जाता है, यह भी 'बूढी काकी ' से पता चलता है। हम भी कल बूढे-पराश्रित होंगे और यह गति हमारी भी हो सकती है, यह सोच-शिक्षा भी दे कर यह कहानी अपने साहित्‍य-धर्म का सुंदर निर्वहन करती है।

के द्वारा:

 लीलाधर से क्‍या श्रृष्टि इतर-पृथक है ? संचालित करने से तो यही ध्‍वनि निकलती है। दूसरे क्‍या संचालित करना क्‍या कर्म नहीं है  ? गीता वगैरह में पढा भी है और ऐसा मानता भी हूं कि उस 'नट-प्रपंची' के लिए करने को कुछ है ही नहीं। जब कुछ करता है तो केवल लीला । जगत -श्रृष्टि भी उसका लीला विस्‍तार ही है। हां, एक बात ओर मैं मानता हूं कि जानकारी के लिए बहुत से साधन-माध्‍यम बाहर हो सकते हैं लेकिन ज्ञान के साथ ऐसा नहीं है।अज्ञान की चढी काई-पर्त के साथ ज्ञान तो हम में , हमारे अंदर ही है।  कई तो कुछ समझ में नहीं आता । लगता है हम तो कुछ जानते नहीं। क्‍या जानना या जान पाना (जिसके बाद कुछ जानने को कुछ शेष न रहे) संभव भी है । कृपया मेरी टिप्‍पणियों को तर्क वगैरह के रूप में न लीजिएगा। आपका लेख्‍य अच्‍छा लगा इसी लिए भावुकतावश लिख गया।

के द्वारा:

जिस भगवान को आप नेट, टीवी ,वीडियो के माध्यम से जानने की राय दे रही हैं............ वास्तव मे वहीं से इस तरह के अभद्र व्यंग आ रहे हैं........... एक समय था जब धारावाहिको मे महिलाएं रामायण ओर महाभारत देखा करती थीं......ओर उसमे से वो राम ओर लक्ष्मण से भाईयों मे प्रेम की शिक्षा..... अपने से बड़ों का सम्मान जैसी संस्कारी ज्ञानवर्धक बातें सिखाया करती थीं.......... किन्तु अब माताओं के लिए घर के भीतर साज़िशों से भरे धारावाहिक जरूरी हो गए हैं........... माँ बाप को इस ओर सोचना चाहिए की उनका बच्चा कितना जानता है रिश्तों के बारे मे ....... स्नेह के बारे मे ...... तब कहीं ये सोचना चाहिये की क्या वो समझता है धर्म के बारे मे........... और जब तक बड़े धर्म का सम्मान नहीं करेंगे तब तक छोटों द्वारा धर्म पर आक्षेप लगाना ठीक  ही है... एक बढ़िया व विचारणीय लेख के लिए हार्दिक बधाई.........................

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

 बहुत अच्‍छा और पठनीय आलेख। कुछ निवेदन : 'ढेर सारी किताबे ,नेट टीवी ,वीडियो बहुत सी ऐसी चीजे है जिनसे हम अपनी संस्कृति के बारे में जान सकते है !' ये स्रोत जितना इस दिशा में सहायक हैं उतने ही और शायद उससे भी ज्‍यादा विकृत करने वाले भी हैं। तमाम उल्‍टी सीधी जानकारियां भी इनमें भरी हैं। सही चित्रण- संदेश के लिए समझदार , जाग्रत विवेक लोगों को आगे आना चाहिए।  कोई शक्ति समूचे विश्‍व को चला रही है-  विश्‍व या जगत प्रपंच और वह 'कोई शक्ति' क्‍या अलग अलग हैं ? जिसे हम चलाना कहते हैं क्‍या वह भी उस शक्ति की 'लीला' ही नहीं है ? कृष्‍ण का समय प्रबंधन- लीला में मैनेजमेंट कैसे ? उनके लिए तो समरथ को नहिं दोघ गोसाईं है। देवर्षि नारद के शब्‍दों में - परम स्‍वतंत्र न सिर पर कोई, भावै मनहि करहि तुम सोई। मैनेजमेंट तो सीमित क्षमता-खक्ति वालों के लिए होता है। सर्वर समर्थ के लिए नहीं। पूतना बध और कालिय दहन को दुराशा और अहंकार को नष्‍ट करने से जोडा जाता है। दुष्‍कामनायें, लोभ-लिप्‍सा और अहंकार के विगलन के उपरांत रास-प्रेम होता है। जीवन में रस प्‍लावन होता है। परमात्‍मा को वेद ' रसोवै स' - वह रस है भी कहते हैं। sdvajpayee.jagranjuction.com

के द्वारा:

अरे भाई , आपने बुद्धिजीवी माना मुझे जान कर अच्छा लगा वरना तो हर कोई मुझे इतना ज्यादा समझा रहा जैसे की मै भाग कर किसी दुसरे धर्म के साथ न बंध जाऊ !!!खैर छोडिये ये सब फालतू टॉपिक है जिसे जिससे भी शादी -ब्याह करना है करे अपने को क्या , कुछ सार्थक लिखना चाहिए देश -दुनिया में बहुत कुछ हो रहा है राजनीति मेरा पसंददीदा विषय है क्योंकि बहुत कुछ घट रहा है हमारे आस -पास उसमें बदलाव जरुरी है | बहुत मै नहीं लिख सकती फिर भी आपने जिस साइलेंट -किलिंग के बारे में लिखा है उससे मै सहमत हूँ क्योंकि बहुत सी चीजे ऐसी है जो इस समाज की आत्मा को धीरे -धीरे मार रही है और हम सब इन बातो को महसूस कर सकते है प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया !

के द्वारा:

आदरणीय रचना जी, नमस्कार मैं सोच ही रहा था कि आप जैसी बुद्धिजीवी पाठक ने मेरे लेख पर विचार क्यों व्यक्त नहीं किये, जबकि मैं जानता हूँ कि आप कभी भी फालतू ब्लॉग पर अपने विचार नहीं देतीं! फिर अभी - अभी मैंने आपका ये लेख पढ़ा और उस लेख को पढ़कर मुझे समझ मैं आया कि अपने विचार व्यक्त क्यों नहीं किये, आप को मेरा लेख शायद ओनर किलिंग का समर्थ करता नजर आ रहा होगा, किन्तु ऐसा है नहीं मैं भी इस तथाकथित ओनर किलिंग के खिलाफ हूँ अगर आपने मेरा लेख पूरा पढ़ा हो तो भी आप ये बात नहीं समझ पाई मुझे अफ़सोस है ! यदि मैं ओनर किलिंग का पक्षधर होता तो मैं अपनी कहानी के नायक संजू के हाथों उसकी बहिन का खून करवा देता और फिर भी उसे सहानुभूति दिलवा देता, मगर मेरा उद्देश्य ये नहीं था, मेरी कहानी का नायक इंसान है, जानवर नहीं, उसमें इतनी परेशानी झेलने के बाद भी अपने अन्दर के भाई को जिन्दा रखा ये उसकी इंसानियत है, और जो लोग भी जान लेते हैं वे इंसान नहीं शैतान होते हैं, उनका समर्थन करना सर्वदा गलत है, किन्तु मैंने जो महसूस किया वो लिख दिया ओनर किलिंग का जनम ही साइलेंट किलिंग से होता है ! आपने एक हत्याकांड का हवाला दिया है, ओनर किलिंग का अगर कोशिश करेंगी तो ८-१० और याद कर लेंगी! मगर साइलेंट किलिंग के शिकार लोगों की गिनती करना भी मुश्किल हो जायेगा रचना जी ! बाकी आप स्वयं समझदार हैं, आपकी प्रतिक्रिया आपके लेख मैं मुझे मिल गई, उसके लिए आपका आभार !

के द्वारा: allrounder allrounder

रचना जी, आपका लेख शायद चाँद और फिजा की प्रेम कहानी के जिक्र के बिना पूरा नहीं होता इसलिए लिखता हूँ| मोहन और अनुराधा ने जिस तरह के प्यार का इज़हार किया था बाकायदा टी.वी. पर आकर उस समय उस पवित्र प्रेम पर युवा प्रेमियों ने बड़ी तालियाँ बजाई थी और तब भी प्यार को बड़ी पवित्र भावना कह कर उनके प्यार का तथाकथि प्रेमियों ने अहतराम किया था काश कि लोग प्यार और वासना का अंतर समझ पाते| आपके ब्लॉग में जो प्यार के लिए सद्भाव व्यक्त हुए है वो अच्छा है बस इतना ही कहना उचित होगा| वैसे तथाकथित प्यार भी ज्यादातर कुंठा के गर्भ से ही उत्पन्न हो रहा है और अनुराधा जैसी समझदार कानूनविद भी भोले भाले म्रदुभाषी मोहन से प्रेम का पूरा ज्ञान लेकर सार्वजनिक रूप से अपनी समझदारी साबित कर चुकी हैं| आप का लेख दिल में कई कौतुहल उत्पन्न कर रहा है आपसे कुछ बड़ा सार्थक सा लिखे जाने की उम्मीद जागी है| पोस्ट अच्छी है विचारों को और विस्तार दें| शुभकामनाएं|

के द्वारा: chaatak chaatak